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एक भुतहा जगह उग्रसेन की बावली

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वैसे तो दिल्ली का मौसम हमेशा धूल भरा और प्रदूषण से परिपूर्ण रहता है। ऐसे में हर दिल्लीवासी बस यही सोचता है कि अपने घर में ऐसी की ठंडक में ही रहा जाए। घर से बाहर कदम रखना तो मानो चेहरे पर धूल भरा पाउडर लिपवाना है। इसलिए शायद दिल्ली के लोगों को दिल्ली में घूमना ज्यादा पसंद नहीं।

लेकिन दोस्तों घुमक्कड़ों को इन सब बाधाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता वह इन धूल, प्रदूषण, तूफान, आंधी, बारिश, कोई भी विषम परिस्थिति की परवाहा नहीं करते वह तो बस निकल पड़ते है। चलिए आज मैं आपको लेकर लेकर चलता हूं दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बनी उग्रसेन की बावली।

बावली के मुख्य द्वार पर मैं

बावली नाम से आप आप समझ ही गए होंगे कि मैं किसकी बात कर रहा हूं। पहले के समय में तथा अभी भी राजस्थान में कई जगहों पर बावलियों का प्रयोग जल संरक्षण के लिए किया जाता है। लेकिन इस बावली की कथा कुछ अलग सी है।

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलने से बाहर निकलने से बाहर निकलने के बाद आप चहल कदमी करते हुए करते हुए या फिर ऑटो से जंतर मंतर होते हुए हैलि रोड पर स्थित उग्रसेन की बावली पहुंच सकते है। यदि आप पहली बार जा रहे हैं तो आपको बाहर से देखने पर ऐसा लगेगा कि यह जगह घुसते ही खत्म हो गई। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ लेकिन अंदर जाते हैं तो पता चलता है कि वास्तव में क्या चीज है।

करीब 60 मीटर लंबी और 15 मीटर ऊंची इस बावली में 105 सीढ़ियां हैं। जैसे ही अंदर घुसेंगे वैसे आपको चौकीदार कहेगा की क्या आपको गाइड की आवश्यकता है मैंने तो गाइड लेने से मना कर दिया। खुद ही देखेंगे खुद ही समझेंगे ऐसा उसको कह दिया।

निहार रहा हूँ बावली को

अब हम ठहरे मौज मस्ती करने वाले आनंद से जीने वाले वाले तो मजे मजे में ही सबसे ऊपर वाली मंजिल पर सामने ऐसी जगह चला गया जहां पहुंचना बहुत मुश्किल है। मुश्किल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीच में दीवार टूटी हुई है और गेट पर डाट लग रही है तो एक ही रास्ता बचता है दीवार फांदकर जाना। खैर यह जोखिम भरा कदम उठाया और पहुंच गया बिल्कुल सामने। पहुंचने के बाद पता चला यार अब वापिस कैसे आऊंगा जितना मुश्किल जाना था उससे कहीं ज्यादा गुना मुश्किल वापस आना हो गया गया दिल की धड़कन एकदम तेज-तेज चलने लगी। खैर मन में साहस को जुटाकर किसी तरह से वापिस आया।

बड़ा खतरनाक है यहां आना

कहाँ से आऊं यहां डाट लगी है

आप यह पढ़कर सामने जाने की कोशिश मत करना क्योंकि खतरे से खाली नहीं है। और जब तक सामने से वापिस नहीं आया था तो मन में इस बावली के सारे भुतहा रहस्य उजागर होने लगे थे। सुना है कि इस बावली में कई मौत के रहस्य दफन है, जिसके पीछे एक कथा प्रचलित है। कहते हैं कि कई सालो पहले एक बार इस बावली में काला पानी भर गया और उस जादुई काले पानी ने कई लोगो को इस पानी में आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। ऐसा माना जाता था कि उस काले पानी में सम्मोहन की शक्ति थी जिससे कई लोगो की जाने चली गयी। तब से अब तक ये बावड़ी हमेशा सुखी ही रहती है केवल बरसात के समय पानी भरा रहता है। और चौकीदार यहां रात को किसी को रुकने नहीं देते कहते हैं कि रात में यहां अजीब प्रकार की आवाजे आती है है।

इन सब बातों के बीच मैं यह तो बताना भूल ही गया कि यह बावली महाभारतकालीन है इसका संबंध महाभारत काल के महाराजा उग्रसेन से है। तथा 14वीं शताब्दी में अग्रवाल समुदाय ने इस बावली का जीर्णोद्धार कराया था। और इस बावली को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित जगहों में रखा हुआ है।

यदि आप कनाटप्लेस के आसपास घूमने आते हैं तो उग्रसेन की बावली देखने जरूर आइए यहां आ कर आपको अच्छा लगेगा एक अलग अलग प्रकार की मन में हलचल जरूर होगी जैसे सांस फूलना आदि यह इस जगह की खासियत है क्योंकि कुछ तो बात है जो इस जगह का रहस्य बनी हुई है।

चलिये आज के लिए इतना ही आगे भी आपको ले चलेंगे ऐसे ही किसी अनोखी जगह पर तब तक बने रहिए मेरे साथ।
आपका हमसफर आपका दोस्त
हितेश शर्मा

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10 thoughts on “एक भुतहा जगह उग्रसेन की बावली”

  1. वंदना गुप्ता says:

    लाजवाब भ्रमण करवा दिया हितेश 🙂

    1. ghumakkri says:

      धन्यवाद वंदना जी

  2. bahut hi badhiya jankakri, ache picture, main bhi jane ka soch raha hu dekhiye kab jana hota hai,

    rahichaltaja.blogspot.in

    1. ghumakkri says:

      धन्वाद जी बिल्कुल आइये घूमने

  3. birendra says:

    हितेश भाई, पढ़ते समय ऐसा लगा जैसे मैं भी आपके साथ ही हूँ, जीवंत चित्रण किया हैतस्वीरें भी अच्छी है पर खींची किसने?

    1. ghumakkri says:

      धन्यवाद जी सेटिंग मैंने कर दी थी कैमरे की और दे दिया था मुसाफिरों को।

  4. यह बाबडी बहुत सुंदर बनी है। यहां पर बैठना अच्छा लगता है। आपने अच्छी सैर करा दी। वह पुरानी यादें भी ताजा कर दी। मैन दरवाजे तक आप पहुँच गए यह खतरनाक होता है। बाकी चित्र बढिया है। घुमक्कड़ी जिंदाबाद….

    1. ghumakkri says:

      धन्यवाद सचिन जी मेन दरवाजे पर पहुंचने के बाद तो नानी याद आ गई। घुमक्कड़ी ज़िंदाबाद

  5. Sujit says:

    धूल से साँस भर जाता है ।।

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